Stomach Cancer Treatment In Hindi

Stomach Cancer Ayurvedic Treatment

Stomach Cancer – आमाषय का कैंसर आज दिन-प्रतिदिन युवा पीढ़ी में तरह-तरह की नई आदतों का समावेष बहुत ही तीव्र गति से हो रहा है और उनमें प्रमुख है-मदिरा-सेवन(Sharab)। इसके सेवन से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसके उदाहरण हैं-तरह-तरह की दुर्घटनाएँ, हृदयरोग, अराजकता, अनुषासनहीनता आदि। इसके अतिरिक्त मदिरा मानव शरीर को खोखला करती हुई एक भयंकर रोग होने का कारण भी है, वह रोग है- आमाषय का कैंसर (Stomach Cancer)।  मुख्य रूप से मृत्यु के समस्त कारणों में आमाषय का कैंसर प्रमुख है। अन्य अंगों की भाँति आमाषय के अर्बुद भी सुदम्य अथवा दुर्दम हो सकते है। यह कैंसर औरतों की अप्रेक्षा पुरूषों में तथा अंग्रेजों की अप्रेक्षा कालों में अधिक होता है। यह निम्न वर्ग में, उच्च तथा मध्यम वर्ग की अप्रेक्षा अधिक होता है। यह बीमारी जापानी लोगों में अन्य की अप्रेक्षा अधिक होती है। इसके अतिरिक्त यह चिली, आइलैंड, आस्ट्रेलिया आदि में भी मिलती है। केवल अमेरिका में ही इस रोग के कारण 25,000 व्यक्तियों की मृत्यु प्रतिवर्ष होती है। यह कैंसर 45 वर्ष से अधिक आयु वालों में प्रायः पुरूषों में पाया जाता है तथा समस्त संसार में करीब 10 प्रतिषत व्यक्ति आमाषय के कैंसर के कारण मृत्यु के घाट उतरते है।

Stomach Cancer Ayurvedic Treatment

Pet Ke cancer Treatment

Stomach Cancer Causes- Pet Ke Cancer Ka Karan

1- जीर्ण आमाषय शोथ अथवा जीर्ण आमाषयिक व्रण से भी।- आमाषयिक पालिपी, परनीषियस अनीमिया आदि से पीड़ित व्यक्तियों में आमाषय कैंसर (STOMACH CANCER) अधिक होता है।

2- रोग के कारणों में आनुवांषिकता (हेरिडिटरी) के होने का पर्याप्त प्रमाण है।

3- आमाषय का जीर्णक्षोभ, जो मुख्यतः अत्यधिक मद्यसेवन, तीक्ष्ण तथा अधिक गर्म पदार्थो का अत्यधिक सेवन इसके सहायक कारण हैं।

4- भोजन में अनियमितता से कैंसर की संभावना अधिक रहती है।

5- ‘ए’ श्रेणी के रक्त वालों में इसके होने की संभावना रहती है।

6- यद्यपि तमाकू एवं धूम्रपान से उत्पन्न शरीर के विभिन्न अंगों के कैंसर की पर्याप्त जानकारी लोगों में है और जब लोग मदिरा का भी सेवन करते है, तो विभिन्न  अंगों के कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। शराब या मदिरा तो अकेले ही आमाषय का कैंसर उत्पन्न करने में सक्षम है।

Stomach Cancer Symptoms – Pet Ke Cancer Ke Lakshan

1- आमाषय के कैंसर से प्रभावित रोगियों में प्रारंभ में खान-पान से पहले या बाद में दर्द के साथ जलन के लक्षण मिलते हैं। अधिकांष रोगी उसे गैस्ट्राइटिस या अल्सर समझते है।

2- आमाषय का कैंसर घाव के रूप में छत्रक (मसरूम) की तरह विकसित होता है और आमाषय की थैली की तरह ही धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने पर रोगी में भूख न लगना, पेट के अन्दर भारीपन होना तथा अजीर्ण होना आदि लक्षण पाए जाते है।

3- भूख लगना या न लगना, मानव शरीर की सामान्य अवस्था में आमाषय ग्रंथियों से पाचक रस के स्त्राव के निकलने अथवा न निकलने पर निर्भर करता है। आमाषय  कैंसर की बीमारी में भूख न लगने के भी लक्षण मिलते है, जो कि आमाषय के अन्दर कैंसर की अनावष्यक वृद्धि के कारण तथा पाचक रस स्त्राव करने वाली ग्रंथियों को दबा देने के कारण भी होता है।  आमाशय की दीवारों पर कैंसर की अनावष्यक वृद्धि के कारण उसमें रूधिर प्रसार अधिक होता है जिससे आमाषय के अन्दर रक्त एकत्रित होने से या खून की उल्टी अथवा रक्त मिश्रित पाखाना होने के भी लक्षण मिलते हैं।

4- अन्य लक्षणों में अजीर्ण रहना प्रमुख है जो पाचन क्रिया के बदलाव के कारण होता है। इसके लक्षण रोग के फैलाव पर निर्भर करते हैं, क्योंकि आमाषय का कैंसर रक्त द्वारा फेफड़ों, यकृत अथवा उदर की रक्षात्मक झिल्लियों में भी पहुँच सकता है। जिससे-सांस फूलना, पीलिया होना तथा पेट में पानी भर जाने के कारण पेट फूलने के भी लक्षण मिल सकते है।  अधिकतर रोगी साल छह महीने से अजीर्ण संबंधी परेषानियों के होने की षिकायत करते हैं और वमन, मितली या बेचैनी और शरीर भार का कम होना भी पाया जाता है। इपीगैस्ट्रिक प्रदेष में उभरा हुआ कठोर भाग (मास) स्पर्ष किया जा सकता है तथा दिखाई भी देता है। परन्तु यह लक्षण उस समय प्रकट होते है जब रोग फैल चुका होता है, और इस अवस्था में शल्यकर्म रोग से छुटकारा दिलाने में असमर्थ होता है। तथ्य यह है कि इस प्रकार के कैंसर अधिकतर प्रारंभिक प्रथम लक्षणों के प्रकट होने से पूर्व ही विक्षेपण ‘मेटास्टेसिस’ की अवस्था तक पहुँच चुके होते हैं।

5- 45 वर्ष से अधिक आयु वाले उन सभी व्यक्तियों में कैंसर का संदेह करना चाहिए। जिनमें दुष्पचन (डिस्पेप्सिया) की षिकायत उपयुक्त चिकित्सा से ठीक न हो और 2-3 सप्ताह तक बनी रहे। रक्त वमन, रक्तयुक्त कृष्ण मलत्याग एवं बिना स्पष्ट कारण के लौह की कमी से होने वाली रक्तन्यूनता हो, तो भी कैंसर का संदेह करना चाहिए। क्षीणता भी पायी जाती है।

Conclusion –  अपच इस कैंसर का प्रारंभिक लक्षण है। इसमें अजीव प्रकार की पाचन से संबधित बेचैनी, हल्का दर्द और भोजन के बाद पेट का तनना, थोड़ी मितली तथा हार्ट बर्न (गले में जलन) आदि है। ये लक्षण यदि दो हफते से ज्यादा या कभी-कभी होते हों, तो डाॅक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

6- अन्य लक्षणों में मल में खून का जाना, उलटी, वजन का कम होना आदि है। दुर्भाग्य से ये लक्षण आने के 20 महीने पहले ही स्टमक ट्यूमर जन्म ले चुका हो सकता है। यह आस-पास की लिफ ग्रंथियों व लीवर तथा फेफड़ों में फैल सकता है।

7- पेट के अल्सर को कई बार गलती से कैंसर मान लिया जाता है। ज्यादातर डाॅक्टरों का मानना है कि यह कैंसर में प्रायः परिवर्तित नहीं होता है। इससे परेषानी यह हो सकती है कि यह कैंसर के लक्षणों को छुपाकर उसके उपचार में देरी कर सकता है।

Kaise Jaine Stomach Cancer Hai?

रोग के आरंभ में किए गए शारीरिक परीक्षणों में कुछ नहीं मिलता है। रोग के बढ़ने पर स्पर्ष लक्ष्य उभार तथा पेट पर पुरःसरण (पेरीस्टाल्सिस) गतियाँ देखी जा सकती है। X-किरणों से भी रोग निर्णय में सहायता मिलती है।

स्त्राव अध्ययन, आमाषय दर्षन, रक्त परीक्षा, विपन्नण कोषिका प्रकरण, भी रोग निर्णायक है।  वैसे रोग की पहचान लक्षणों पर काफी हद तक हो सकती है। फिर भी पुष्टि के लिए औषधि मिलाकर पेट का एक्स-रे अथवा इंडोस्कोप के द्वारा निरीक्षण तथा प्रभावित स्थान से मांस का टुकड़ा लेकर जाँच की जाती है।

Stomach Cancer Treatment Hindi

प्रारंभिक अवस्था में ही पता लग जाने पर शल्यक्रिया द्वारा सदा-सदा के लिए ठीक हो सकता है। पर रोगी अज्ञानता के अंधकार में भटकता रहता है, जिससे रोग की स्थिति गंभीर होती जाती है।  शल्यक्रिया में आवष्यकतानुसार आमाषय का आंषिक या पूर्ण छेदन किया जाता है। इस प्रकार से स्थिति के अनुसार पूरा आमाषय या उसका कुछ भाग निकाल देते हैं। कभी-कभी अन्य भागों जैसे-प्लीहा, पैंक्रियाज आदि को भी निकाल देते हैं, यदि यह लगता है कि उन पर भी कैंसर का असर हो चुका है। आमाषय निकालने के बाद भी रोगी सामान्य जीवन बिता सकता है। आॅपरेषन के बाद पाचन में आयी गड़बड़ियों को धीरे-धीरे कई खाने व जिनमें कार्बोहाइड्रेट कम तथा प्रोटीन व वसा अधिक देकर उपचार किया जा सकता है

-रोगी का भविष्य-रोगी का जीवन कैंसर की स्टेज या स्थिति तथा उपचार शुरू करने की स्थिति पर निर्भर करता है। जिन मरीजों में सर्जरी कैंसर फैलने के पहले कर दी जाती है। उनमें 40 प्रतिषत रोगी 5 वर्ष से अधिक जीवित रहते हैं। यदि आस-पास के भागों में कैंसर फैल चुका होता है, तो यह संभावना केवल 13प्रतिषत रोगियों में ही रह जाती है।

आमाषय कैंसर (STOMACH CANCER) Ayurvedic Treatment Hindi –

1- आमाषय कैंसर (STOMACH CANCER) की प्रारंभिक अवस्था में जबकि रोगी को भोजन करने में असमर्थता, उग्रषूल, वमन आदि कष्ट रहते हैं, तब निम्नलिखित औषधियों के प्रयोग से निगरण, हरण तथा उग्रषूल आदि का शीघ्र निवारण हो जाता है। साथ ही अर्बुद की वृद्धि रूक जाती है। इन कैंसर निवारक औषधियों को अनेको रोगियों पर अजमाकर देखा गया है सफलता मिलने पर ही इनको चिकित्सा क्षेत्र में मान्यता प्रदान की गई है। पर यह औषधियाँ रोग की प्रथमावस्था में ही उपयोगी है। बाद को केवल शल्यचिकित्सा ही कारगर होती है।

2- अत्यधिक आमाषयषूल की अवस्था में-‘तालमंडूर’ अथवा ‘धात्रित्यारिष्ट’ 20 मि.ली. दिन में 2 बार भोजनोपरांत सेवन कराने से लाभ मिलता है। नया खून बनने लगता है और कमजोरी दूर होती है।

3- भिलावा को कूटकर पानी में भिगोकर उस पानी से उगाए हुए गेहूँ के ज्वर को कैंसर के रोगी को पिलाने से पर्याप्त लाभ मिलता है।

4- बरगद के पेड़ की भस्मित छाल को जल तथा हरे नारियल के पानी के साथ सायंकाल प्रतिदिन सेवन कराते हैं।

5- प्रवाल भस्म 5 ग्राम की मात्रा में मधु के साथ प्रातः काल 10 बजे नियमित रूप से सेवन कराते रहने के कैंसर के रोगी को आषातीत लाभ होता है।

6- द्राक्षारिष्ट 20-30 मि.ली. दिन में 2 बार भोजनोपरांत शीतल जल के साथ 2-3 माह तक नियमित रूप से सेवन कराते रहने से कैंसर के रोगी को भूख खुलकर लगने लगती है और शारीरिक क्षीणता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

7- आदित्यरस का सेवन प्रतिदिन प्रातः काल अदरक के रस, नींबू के रस, शक्कर तथा मधु के साथ सेवन कराने से 3-5 माह में कैंसर की वृद्धि रूक जाती है और रोगी को आषातीत लाभ मिलता है।