Pregnancy Care In Hindi – गर्भावस्था में होने बीमारी और उनके इलाज

Pregnancy Me Hone Me Rog

Pregnancy  Care – Pregnancy Me hone Vali Rog Aur Un Rogo Ka Rog Upchar

Pregnancy Me Hone Me Rog

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1- गर्भावस्था (Pregnancy) में उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure ) की समस्याएँ (Problem) –

गर्भ धारण करने के बाद महिलाओं में उच्च रक्तचाप हो जाना आम समस्या है। यदि उच्च रक्तचाप से पीड़ित महिलाएँ गर्भ धारण करती हैं तो उनका रक्तचाप अचानक बढ़ सकता है, जिसकी रोकथाम करना कठिन होता है। गर्भावस्था में यदि रक्तचाप कम बढ़ता है तो हो सकता है इसे शिशु थोड़ा-बहुत प्रभावित हो जाएं। कुछ महिलाओं मे गर्भकाल में रक्तचाप बढ़ने के साथ ही पेशाब में एल्बूमिन, प्रोटीन और शरीर में सूजन आ जाती है। इसे ‘प्री एम्लेमसिया’ कहते हैं जोकि आने वाली गंभीर रोग की चेतावनी है। यदि इसका समय से उपचार नहीं किया गया तो गर्भवती महिला को झटके लग सकते हैं और वह बेहोश हो सकती है, जिसको ‘एक्लेंपसिया’ या ‘टाक्सीमिया’ आफ प्रिगनेंसी’ कहा जाता है।

2- गर्भावस्था (Pregnancy) में गुर्दा रोग (Kidney Rog) की समस्याएँ (Problem) –

गर्भकाल के दौरान महिलाओं का वजन औसतन 7-8 किलो बढ़ जाता है जिस का श्रेय शरीर में गर्भाशय शिशु, प्रोटीन, फैट और पानी इकट्ठा होने को जाता है। इस दौरान दिल से हर मिनट निकलने वाले खून की मात्रा करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, और दिल को जरूरत से ज्यादा काम करना पड़ता है। गुर्दा का काम शरीर में मौजूद दूषित पदार्थो को निकालना है। गर्भावस्था में गुर्दे का रक्त प्रवाह भी बढ़ जाता है और उत्सर्जन तंत्र में अनेक बदलाव होते हैं, किडनी में रक्त छनकर द्रव्य की मात्रा बढ़ जाती है, गुर्दे से निकलने वाली नलिकाओं तथा गुर्दे से मूत्राशय तक मूत्र पहुँचाने वाली नली (यूरेटर) चैड़ी हो जाती है। कुछ महिलाओं में गर्भ के समय गुर्दे का रोग होने से निम्न समस्याएँ हो सकती हैं, पर समय पर पहचान कर उचित उपचार से उसके गम्भीर परिणाम को टाला जा सकता है।

3- गर्भावस्था (Pregnancy) में एक्लेंपसिया (Eclampsia Rog) की समस्याएँ (Problem) –

गर्भवती महिलाओं में एक्लेंपसिया का होना खतरे की घंटी जैसा है। इसमें मरीज को तुरंत अस्पताल में दाखिल करें। दवा के साथ उसे पूर्ण आराम दें। भोजन में नमक व पानी को नियंत्रण में रखें। यदि गर्भ 36 सप्ताह से ज्यादा समय का है तो प्रसव करवाना आवश्यक हो जाता है। यदि गर्भ का समय 36 सप्ताह से कम है तो ‘रक्तचाप’ धीरे-धीरे कम करने के लिए दवाएँ दी जाती है और जब गर्भ 36 सप्ताह का हो जाता है तो प्रसव करवाया जाता है। गर्भावस्था में एक्लेंपसिया है या नहीं, इसकी जानकारी के लिए नियमित अंतराल में ब्लड प्रेशर और पेशाब की जांच अति आवश्यक है। गर्भावस्था में ‘हाई ब्लड प्रेशर’ की समस्या पहली बार गर्भ धारण करने वाली 10 से 20 प्रतिशत महिलाओं में हो सकता है। यदि जुड़वां बच्चे हैं और महिला शुगर की मरीज है या गुर्दा रोग से पीड़ित है या गर्भाशय किसी और रोगों से पीड़ित है तो उच्च रक्तचाप होने की संभावना बढ़ जाती है। यदि गर्भावस्था में महिलाओं के पेशाब में प्रोटीन ज्यादा मात्रा में आने लगता है तो यह गुर्दे के प्रभावित होने का संकेत है। उच्च रक्तचाप के अलावा भी महिलाओं में गर्भावस्था में गुर्दो से संबधित अनेक समस्याएं हो सकती है, जैसे- गर्भावस्था में गुर्दो में मौजूद कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।

4- गर्भावस्था (Pregnancy) में गुर्दो में खराबी (Kidney Me kharabi bimari) की समस्याएँ (Problem) –

गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप, मिर्गी के दौरे शल्यक्रिया द्वारा प्रसव कराने का पूर्व इतिहास, गर्भपात आदि अनेक कारण हैं, जो गुर्दो को निष्क्रिय बना सकते हैं। सबसे पहले पीठ में गुर्दे के स्थान पर दर्द तथा पेषाब में जलनयुक्त दर्द रोग के शुरूआती लक्षण हैं। बाद में मूत्र में एल्ब्युमिन प्रोटीन आना आरम्भ हो जाता है और फिर पेषाब का एकदम बंद हो जाने का मतलब है कि गुर्दो ने काम करना बंद कर दिया है। ऐसे में गर्भकाल के 9 महीनों के दौरान प्रतिमाह पेषाब व हीमोग्लोबिन की नियमित जांच करानी चाहिए।

5- गर्भावस्था (Pregnancy) में ज्यादा उल्टियां (Vomiting ) होने पर-

जी मिचला (Jee Machlna) कर उलटियों का आना ही गर्भकाल की विशेष पहचान है और यह क्रम प्रथम 3 माह तक चलता है। यदि उलटियां ज्यादा होने लगें तो यह खतरनाक भी साबित हो सकता है। ज्यादा उलटियों से ‘निर्जलीकरण’ की स्थिति पैदा हो सकती है। सांस में ‘एसीटोन’ की बदबू आ सकती है तथा पेशाब में एल्ब्युमिन की मात्रा बढ़ सकती है। नाड़ियां सुन्न पड़ सकती हैं तथा आंखों को भी हानि पहुँच सकती है। ऐसी स्थिति में गर्भवती महिला को धैर्य बंधाना आवश्यक है। चिकित्सक की देखरेख में ही शरीर में जल तथा आवश्यक लवण पहुंचाए जाते हैं, जो पुनर्जलीकरण की स्थिति पैदा करते हैं। विटामिन बी कांप्लेक्स तथा उलटियां रोकने वाली दवा भी चिकित्सक की देखरेख में ही लें। किसी भी सूरत में डाॅक्टर के परामर्श को न टाले। स्त्री को पीलिया हो, वह अधिक उनींदी, अधिक बोलने वाली या उत्साहित लगने लगे, उस के पेट के निचले हिस्से में अधिक पीड़ा हो। मानसिक तनाव, अधिक महत्वाकांक्षा, जिगर में ग्लाइकोजन का गिरता स्तर आदि इस रोग के मुख्य कारण हैं।

6- गर्भावस्था (Pregnancy) में  मलेरिया (Malaria ) होने पर-

मलेरिया परजीवी (प्लासमोडियम वाइवेक्स, फेलसीपेरम, ओवेल) के काटने से होता है। सर्दी, कंपकंपी के साथ-साथ तेज ज्वर, सिरदर्द आदि इसके प्रमुख लक्षण है। गर्भकाल में मलेरिया से शरीर की प्राकृतिक रोग निरोधक क्षमता का ह्रास होता है विशेषरूप से प्रथम प्रसव में समय। मलेरिया के तेज ज्वर से गर्भपात भी हो सकता है या प्रसव पीड़ा भी हो सकती है। यदि इस रोग में शिशु का जन्म हो तो उसका वजन सामान्य से कम होता है। अतएव ऐसे में तुरन्त चिकित्सक की देखरेख में दवा का सेवन करना चाहिए। मच्छर न काटें इसके लिए गर्भवती स्त्री को मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए। तेज ज्वर में गीली पट्टियां शरीर पर रखनी चाहिए।

7- गर्भावस्था (Pregnancy) में मधुमेह (Diabetes) हो जाने पर-

गर्भकाल में मधुमेह होने पर गर्भवती को इंसुलिन की अधिक मात्रा की आवश्यकता रहती है। मधुमेह होने पर गर्भवती की गुर्दो की शक्कर से निबटने की क्षमता का ह्रास होता है। जिससे महिला के पेशाब द्वारा शक्कर अधिक मात्रा में निष्कासित होने लगती है जिससे मधुमेह को नियंत्रित करने में दिक्कत आती है। मधुमेह के कारण शिशु की मृत्यु, शिशु में कुछ जन्मजात रोग, गर्भवती महिला में उच्च रक्तचाप, मिर्गी आदि की भी संभावना रहती है। मधुमेहयुक्त शिशु मोटा, थुलथुला तथा 4-4.5 किलोग्राम वजन का होता है। जन्म से 48 घंटे तक का समय उसके लिए खतरनाक होता है जिसमें शिशु को सांस की बीमारियों का भी अंदेशा रहता है। इसलिए गर्भकाल के शुरू से ही नियमित रूप से स्त्री के रक्त, मूत्र व शर्करा स्तर की जांच प्रतिमाह कराते रहना चाहिए ताकि रोग को शुरू में ही नियंत्रित किया जा सके। मधुमेह से पीड़ित महिला को प्रसव के लिए समय से पहले अस्पताल में दाखिल हो जाना चाहिए।

8- गर्भावस्था (Pregnancy) में एनीमिया (Anemia) होने पर-

वैसे एनीमिया की समस्या आम है मगर गर्भकाल में यह समस्या दोगुनी हो जाती है क्योकि गर्भवती स्त्री को लौह तत्व की आवश्यकता सामान्यावस्था से लगभग दोगुना होती है। शारीरिक कमजोरी, सिरदर्द, चक्कर आना, लड़खड़ाहट, हल्के श्रम से सांस फूल जाना आदि लक्षण इस रोग की पहचान है। डाॅक्टरों के अनुसार लगभग 4 सौ मिलीग्राम लौह तत्व केवल गर्भस्थ शिशु के विकास हेतु तथा 6 सौ मिलीग्राम स्वयं गर्भवती महिला के लिए अनिवार्य है। एनीमिया के कारण गर्भपात, गर्भस्थ शिशु की मृत्यु, समय से पहले प्रसव हो सकता है। क्योकि एनीमिया के कारण शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त आक्सीजन नहीं मिल पाती है। फलस्वरूप गर्भवती के शरीर की प्राकृतिक रोग निरोधक क्षमता का हा्रस हो जाता है जिससे उसे अनेक प्रकार के संक्रमण घेर लेते है। एनीमिया से बचने के लिए गर्भवती को हर माह में हीमोग्लोबिन की जांच कराते रहना चाहिए और लौह तत्व से भरपूर भोजन करना चाहिए।

9- गर्भावस्था (Pregnancy) में दिल की बीमारी (Dil Ki Bimari) होने पर-

गर्भकाल में शरीर पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ हृदय को ही झेलना पड़ता है और इस पर प्रसव एक शक्तिशाली कसरत है। इस काल में दिल का दौरा पड़ने की संभावना भी रहती है। ऐसे में निम्न हिदायतों का पालन करना जरूरी है। यदि आप को खुद के हृदय रोगी होने का पता है तो एनीमिया, श्वास व गले के संक्रमण से बचने का हर संभव प्रयास करें।

1-यदि ‘माइट्रल वाल्व’ से संबंधी बीमारी है तो गर्भ का 7 वां माह शुरू होने से पूर्व ही शल्य क्रिया द्वारा इसका उपचार करा लें।

2-यदि गर्भवती महिला स्वयं जन्मजात हृदय रोग से ग्रस्त हो तब भी छठे या 7 वें महीने से पहले शल्य क्रिया रोग का पूर्ण उपचार करा लें।

3-कई बार जटिल हृदय रोग के कारण शरीर गर्भावस्था का भार वहन नहीं कर पाता है। ऐसे में यदि चिकित्सक गर्भपात करा लेने की सलाह दे तो इसे मान लेना चाहिए।

10- गर्भावस्था (Pregnancy) में आकस्मिक शिशु का जन्म हो तब-

यदि गर्भवती स्त्री पेट में ऐंठन की रूक-रूक कर होने वाली पीड़ा से पीड़ित हो तो उसे प्रसव पीड़ा ही समझना चाहिए और तुरन्त डाॅक्टर को बुलाना चाहिए मगर डाॅक्टर के आने तक-

1-स्त्री को आराम से सीधा लिटा दें। सिर के नीचे तकिया लगा दें। खय या गर्म दूध पिलाएं। दर्द होने पर उसे जोर लगाने को मना करें किन्तु श्वास जल्दी-जल्दी लेने को कहें। इसे शिशु होने पर मांस फटता नहीं।

-यदि डाॅैटर के आने के पहले ही बच्चा हो जाए तो उसको कंबल या कपड़ ओढ़ा कर मां की दोनो टांगो के बीच लिटा दे (नाल को न छेडे़)। ध्यान रहे बच्चे को सांस लेने में असुविधा नहीं होनी चाहिए।

11- गर्भावस्था (Pregnancy) में रक्तस्त्राव (Koon Niklne) होने पर-

यदि गर्भकाल के प्रारंभिक दौरे में रक्तस्त्राव होता है तो यह गर्भपात का सूचक है। रक्तस्त्राव के अन्य कारणों में गर्भाशय की कोमल दीवारों में चोट लगना, गर्भस्थ शिशु के विकास में बाधा, नाभि नाल में खराबी, रक्त नलिकाओं का फट जाना, अंडे या शुक्राणुओं में रचने में खराबी का होना आदि शामिल हैं और भी कई रोग रक्तस्त्राव के लिए उत्तरदायी हैं जिनमें तेज ज्वर, मलेरिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह आदि मुख्य हैं। छठे माह में रक्तस्त्राव के लिए (3-6 माह) गर्भाशय की व्याधियां या फिर गर्भपात उत्तरदायी है। गर्भनली की व्याधियों के कारण 7वें महीने या इसके बाद रक्तस्त्राव होता है। अतः गर्भावस्था में ऐसा होने पर तुरन्त डाॅक्टर से मिलना चाहिए।

12- गर्भावस्था (Pregnancy) में शारीरिक संक्रमण (Infection) होने पर-

गर्भावस्था में विभिन्न अवयवों का संक्रमण आम बात है। इस लिहाज से संवेदनषील संस्थान है। ‘मूत्र संस्थान’ गर्भाषय के बढ़ते आकार के कारण गुर्दो व पेषाब नलिकाओं पर अनावष्यक दबाव बढ़ता है जिससे पेषाब की मात्रा भी बढ़ती है और संक्रमण का खतरा भी। अतः गर्भकाल में पेषाब में जलन या दर्द की षिकायत होने पर तुरन्त पेषाब का परीक्षण करवा कर दवा लेनी चाहिए।

13- गर्भावस्था (Pregnancy) में सिर दर्द(Sar Dard), चक्कर (Chakkar) या मिर्गी (Mirgi) होने पर-

उच्च रक्तचाप, शरीर में सूजन, पेषाब में एल्ब्युमिन की उपस्थिति आदि लक्षण ‘टाक्सिमीया आफ प्रेगनेंसी’ कहलाते है। मांषपेषियों का तीव्र संकुचन (मिर्गी का दौरा) हो तो इसे ‘एक्लेंपसिया’ के नाम से पुकारा जाता है। अतएव नियमित परीक्षण जरूरी है। इसमें रक्तचाप, वजन, हीमोग्लोबिन, पेषाब की जांच शामिल है ताकि रोग पर शुरू में ही काबू पाया जा सके।

14- ढलती उम्र (Jayda Umer ) में प्रथम बार(Pahli Bar) मां (Maa) बनने पर –

जो स्त्रियां 35 वर्ष की आयु या इसके बाद मातृत्व धारण करती हैं वे इस ढलती उम्र के समूह में आती हैं। ढलती उम्र में गर्भधारण के कुछ खतरे हैं जैसे गर्भपात, उच्च रक्तचाप, मोटापा, मिर्गी के दौरे पड़ना, पेषाब में उल्ब्युमिन आना, गर्भाषय में गांठ पड़ना, जो कैंसर में बदल सकता है, माता की जान को खतरा, प्रसव पीड़ा का लंबे में समय तक अनवरत बने रहना आदि। इस प्रकार की माताओं को प्रसव के लिए किसी बड़े अस्पताल में समय से भरती होने की सलाह दी जाती है।