Muh Ka cancer

Muh Ka Cancer Treatment Hindi

अन्य कैंसरों की तरह मुँह का कैंसर भी कोषिकाओं की असामान्य वृद्धि से ट्यूमर या कोषिकाओं के ढेर का निर्माण करता है। ओरल कैंसर के अन्तर्गत ओंठों, मुँह या ओरल केविटी फैंरेक्स व ऊपरी गले के कैंसर आते है। ये कैंसर प्रायः आसानी से दिख जाते है।  इन कैंसरों में प्रमुख हैं- मुँह के प्लोर का कैंसर, फैंरेक्स या साफट प्लेट का कैंसर, ओंठों का कैंसर तथा जीभ का कैंसर। अन्य कैंसरों में सेलीवरी ग्रंथि, मसूड़ों, तालू तथा बक्कल म्यूकोसा के कैंसर प्रमुख है। मुँह का सबसे अधिक कैंसर गालों के भीतरी भाग के ऊतकों (बक्कल म्यूकोसा), मसूड़ों, नीचे का तालू, भोजन नली के ऊपरी हिस्से, कंठ, ओंठ और जीभ में होता है। मुँह के कैंसर के अन्तर्गत अन्य दूसरे अंग जैसे- लार ग्रन्थियों, ऊपरी मुख तालू तथा गुहा की ऊपरी छत का कोई भी भाग हो सकता है। कारण- 1 मुँह के कैंसर होने का मुख्य कारण तम्बाकू, जर्दा पान और विभिन्न पान-मसालों को ज्यादा समय तक चबाना है। 2 काफी मात्रा में बीड़ी, सिगरेट पीना, तम्बाकू आदि का सेवन तथा शराब आदि पीना भी मुख कैंसर का प्रमुख कारण है। 3 भारतीय चिकित्सा परिषद्् के आँकड़ों के अनुसार प्रति एक लाख की आबादी में 15 पुरुषों को एवं 7 महिलाओं को मुँह का कैंसर होने की सम्भावना रहती है। जो कि 15-20 पान मसाले के पाउच प्रतिदिन खाने के आदी हैं और जिनके मुँह में सफेद या भूरे रंग के चकत्ते हैं या फिर जिनका मुँह पूरी तरह खुल नहीं पाता। वस्तुतः ये दोनों स्थितियाँ मुँह के कैंसर की पूर्वावस्थाएँ है और एक प्रकार से मुँह का कैंसर होने के लिए खतरे की घंटी है।

Muh Ka cancer Ke Lakshan –

1  आवाज में बदलाव।

2 मुँह या जबड़े को चलाने में कठिनाई।

3 लगातार गले का बैठ जाना।

4 गले में कुछ अटके रहने का आभास।

5 गर्दन में गाँठ या सूजन का आना।

6 प्रभावित अंग की तरफ सिर में दर्द महसूस होना। इनमें से कोई भी लक्षण कैंसर के अलावा किसी अन्य कारण से भी हो सकता है। अतः इन परिस्थितियों में चिकित्सक द्वारा मुँह व गले की गहन जाँच आवष्यक है।  मुँह का कैंसर दूसरे अंगों के कैंसर की भाँति इसका प्रसार गर्दन की गिल्टियों में तथा आस-पास के स्थानों में होता है। फेफड़ों तथा दूरस्थ अंगों में इसका फैलाव बहुत ही कम होता है।

यदि दाँतों की जाँच के दौरान दाँतों का डाॅक्टर कैंसर के शुरूआत के संकेत देखकर कैंसर की संभावनाएँ व्यक्त करता है, तो उसको तुरंत कैंसर नमूना जाँच (बायोप्सी) करनी चाहिए। ताकि यह पता चल सके कि वह घातक है अथवा नहीं उस संभावित जगह से नमूने के रूप में ऊतकों का थोड़ा-सा भाग सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) से विस्तारपूर्वक जाँचा जाता है। इन ऊतकों को जाँच, परीक्षण करने वाला डाॅक्टर एक वैज्ञानिक होता है, जो ऊतको में आए बदलाव के कारणों को बता सकता है।

Muh Ka cancer Treatment Hindi – कैंसर के बेहतर इलाज के लिए चिकित्सक कई तथ्यों पर ध्यान दे सकता है, जिसके साथ वह रोगी के पहले के चिकित्सकीय इतिहास, स्वास्थ्य, कैंसर की स्थिति एवं प्रकार तथा बीमारी का फैलाव आदि शामिल है। इलाज रोगी की आवश्यकताओं के मुताबिक किया जाना चाहिए। कैंसर का पता चलते ही इलाज तुरन्त शुरू हो जाना चाहिए। कई बार ट्यूमर या रसौली को निकालने के लिए शल्यकर्म (आॅपरेशन) भी किया जा सकता है।

1- मुँह के कैंसर (Muh Ka Cancer )की विकिरण चिकित्सा- इस चिकित्सा का उपयोग उस समय किया जाता है, जब विशेषकर बड़े ट्यूमर को नष्ट करना होता है, जिन्हे आॅपरेशन के द्वारा आसानी से नही निकाला जा सकता है। विकिरण (रेडिएशन) चिकित्सा में एक्स-रे के रूप में एक्स तथा गामा किरणों की भारी मात्रा रेडियोएक्टिव स्त्रोत के साथ प्रयोग की जाती है, जिन्हें कोबाल्ट 60 यूनिट कहते है।  विकिरण चिकित्सा का सिद्धान्त मुख्य कैंसर वाली जगह पर पूरा विकिरण जोर डालकर घातक कोशिकाओं को नष्ट करने पर आधारित है, जिसमें स्वस्थ कोशिकाओं को कम से कम हानि पहुँचाने का प्रयत्न किया जाता है।

2- मुँह में अल्सर- त्वचा पर या मुँह के भीतर का कोई घाव या छाला यदि लम्बे समय तक न भरे तो आपको डाॅक्टर से मिलना चाहिए। घाव या छाला किस प्रकार का है, इसका पता लगाने के लिए बायोप्सी करवाने की जरूरत पड़ सकती है। सामान्य तौर पर अल्सर या छाले या घाव 15-20 दिन में भरकर ठीक हो जाते है, किन्तु यदि घाव या छाला एक माह से ज्यादा समय तक न भरे या ठीक न हो, तो यह कैंसर वाला भी हो सकता है। तुरन्त किसी सर्जन से मिलिए। बायोप्सी करवाकर शक दूर किया जा सकता है।  इस प्रकार का इलाज कई हफतों तक चलाया जाता है। ओंठों के कैंसर की चिकित्सा में इसका प्रभाव चेहरे को बिना नुकसान पहुँचाए काफी जल्दी पड़ता है।  रेडिएशन अर्थात् विकिरण चिकित्सा के लिए उच्च वाल्टेज वाला यंत्र प्रयोग किया जाता है, जैसे लीनइयर एक्सलेरेटर अथवा बीटाट्रोन। कई रेडियोथैरापिस्ट स्थानीय जीभ, ओंठ और निचले तालु का इलाज दूसरे तरीकों से करते हैं, जिसे इंटरस्टीशियल रेडिएशन अथवा बैक्रीथेरेपी कहते है। इसके अन्तर्गत रेडियो एक्टिव आइसोटोप से प्रभावित सुईयाँ कैंसर वाली जगह पर रख दी जाती है।

3- रेडिएशन इलाज के कुछ कुप्रभाव भी हैं- विकिरण चिकित्सा के बाद कुछ कुप्रभाव उभरकर के सामने आ जाते है जैसे कि निगलने या चबाने में पीड़ा हो सकती है अथवा मुँह में गंध का अनुभव न हो।
मुँह के कैंसर की रोकथाम- मुँह के कैंसर के बारे में सर्वोत्तम माचार यह है कि अधिक से अधिक लोगो को बचाया जा सकता है। मुँह के कैंसर की रोकथाम तथा उसकी दर को कम करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए-1 लोगो का जागरूक बनाएँ, विशेषकर स्कूली छात्रों को किसी भी तरह के तम्बाकू उपयोग की आदतों से बचाएँ, जैसे- धूम्रपान, पान के साथ तमाकू या तमाकू के बिना पान खाने की आदत। 2 किसी भी रूप में तमाकू प्रयोग करने वालो को मना करें। यदि वह बिलकुल बंद नहीं कर सकते है, तो कम से कम प्रयोग करने की कोश्शि करें। ये लोग तमाकू के योग के बाद रात को सोने से पहले मुँह की सफाई अवश्य करें। 3 दाँतों की कोई भी समस्या होने पर तुरन्त दाँतों के डाॅक्टर को दिखाएँ।     विश्व स्वास्थ्य संगठन का सुझाव है कि तमाकू सेवन के खतरों से एक हद तक बचने के लिए तमाकू चबाने के बाद मुँह को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए तथा मुँह में तमाकू (खैनी) रखकर नहीं सोना चाहिए।

Muh Ka Cancer Ayurvedic Treatment

Muh Ka Cancer Gharelu Nuskhe –  रोज 1 ग्राम हल्दी का सेवन करने वाले को किसी प्रकार का कैंसर होने का खतरा नहीं रहता है।उनके अनुसार हल्दी के सेवन से शरीर में बीमारियों से जूझने की क्षमता बढ़ जाती है। विभिन्न प्रयोगो से पता चला है कि हल्दी से कोशिकाओं में मौजूद डी. एन. ए की मात्रा बढ़ जाती है। 2 सर्वपिष्टी का उपयोग मुख के सभी कैंसरों तथा प्रत्येक स्टेज के कैंसर की सर्वश्रेष्ठ औषधि सिद्ध हुई है। 3 ऊध्र्व ओष्ठ के कैंसर की चिकित्सा में- रोग की प्रारंभिक अवस्था में खदिरारिष्ट, महातिक्तधृत अमृत भल्लातक के प्रयोग से लाभ होता है। हरताल भस्म को अमृतादि पाचन, वृह्द माजिष्ठादि पाचन के साथ देने से उत्तम लाभ मिलता है। इस कैंसर की गंभीर अवस्था में रसपर्पटी, व्रण रक्षार्थ तैल, नागवलारिष्ट, महातिक्त घृत, पचतिक्तघृत गुग्गुल का सेवन कराया जाता है।

2- Muh Ka Cancer Desi Ilaj – गाल के कैंसर की चिकित्सा में- इसकी चिकित्सा के अन्तर्गत प्रारम्भिक अवस्था में पंचकर्म से और उसके उपरांत धातु औषधियों के सेवन से आषातीत लाभ होता है। व्रण के प्रक्षालन के लिए त्रिफला और नीम के पानी का व्यवहार उत्तम रहता है। जब मुख के कैंसर में जबड़ा जाम हो जाए तब दषमूल के पानी का व्यवहार उत्तम रहता है। सरवाइकल ग्लैंडस (ग्रीवा की ग्रंथि) के शोथ तथा जबड़ा के जाम होने पर परषड्बिंदु तैल, दषमूल तैल के नस्य से जाम जबड़े को दूर किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ‘‘इरिमेधाध्य तैल’’ तथा ‘‘बकुलाध्य तैल’’ के गरारे से भी गाल के कैंसर के व्रण का रोपण होता है। मुष्क कर्पूर और कत्था को पीसकर शुद्ध मक्खन में मिलाकर लेप करने से गाल के कैंसर का रोपण शीघ्र होता है। पूर्ण अनुभूत है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित योगों के प्रयोग से भी गाल के कैंसर में विषेष लाभ होता है-

1 महातैलेष्वर रस- 250 मि ग्रा. प्रातः काल शुद्ध मक्खन के साथ दें।

2 शुद्ध हिंगुल- प्रातः 10 बजे चीनी या मधु के साथ। अथवा महाभल्लातक प्रातः10 बजे चीनी के शर्बत के साथ दें।

3 पंचतिक्तघृत, गुग्गल सायंकाल साधारण गर्म जल के साथ दें। अथवा-मदनातक मोदक हल्के गर्म दुग्ध के साथ सायंकाल दें।

4 इसके साथ ही-त्रिसति प्रसारिणी तैल- इसका मर्दन शोथयुक्त स्थान पर प्रतिदिन।अन्य औषधियों में-सारिवध्यासव, वातारि रस, पंचातिक्तघृत गुग्गल, द्राक्षारिष्ट, सर्ववातरि रस, आदित्य रस का उपयोग किया जा सकता है।  इसके अतिरिक्त गाल के कैंसर में जौ या गेहूँ की रोटी, ताजे पके मीठे फलों का रस, मूँग, चने या अरहर की दाल, साठी चावल, शुद्ध घी, मक्खन, जामुनों का जूस तथा ताजे मीठे फलों का रस दिया जा सकता है।