Garbhavastha (गर्भावस्था ) Me Youn (सम्भोग) गलत या सही ?

Garbhavastha गर्भावस्था में यौन सम्बन्ध सही या गलत

GARBHAVASTHA गर्भावस्था में यौन (YOUN) सम्बन्ध-उचित या अनुचित

Garbhavastha गर्भावस्था में यौन सम्बन्ध सही या गलत

Garbhavastha Sambhog kaise kare?

दाम्पत्य जीवन में यौन (YOUN) संबंध (SAMBANDH) आवश्यक भी हैं, महत्वपूर्ण भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इन पर कोई लगाम और नियंत्रण की जरूरत ही नहीं। ये संबंध (SAMBANDH) भी जरूरी हैं और स्थिति-परिस्थिति अनुसार इन पर नियंत्रण भी जरूरी होता है।  गर्भ ठहर जाने के पश्चात् यौन (YOUN)-क्रिया के लिए कुछ बातों की जानकारी अवश्य होनी चाहिए। क्योंकि जानकारी के अभाव में असावधानी से किया गया समागम गर्भ के लिए समस्या बन सकता है, इसलिए निम्नलिखित पहलुओं पर गौर करना आवश्यक होगा।

गर्भ विवाह के एकदम पश्चातहमारे समाज में विवाहोपरान्त गर्भ धारण करना पति-पत्नी के लिए भले ही जरूरी न हो, किनतु परिवार के अन्य सदस्य यही चाहते हैं कि बहू जल्द मां बने। विशेषकर सासें इसके लिए कुछ अधिक ही ख्वाहिशमंद रहती है कि वर्ष के भीतर ही घर में बच्चा आ जाए और वह भी लड़का। ऐसी स्थिति में पति-पत्नी का आपी संबंध (SAMBANDH) एक-दूसरे को जानने-पहचानने और अच्छी तरह समझने की जगह केवल यौन (YOUN) से जुड़ा रहता है, पूरी तरह एक-दूसरे को समझने और मानसिक ताल-मेल बैठाने की बात पीछे रह जाती है। यदि गर्भ ठहर गया, तो सारा परिवार प्रसन्न हो जाता है।  बहू के पैर भारी होने की खुशी में पति-पत्नी की अपनी इच्छाएं-अपेक्षाएं क्या हैं, इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता पत्नी खुद भी इस ओर से बेखबर रहती हैं, क्योंकि गर्भ का ठहर जाना उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण घटना बन जाती है। लेकिन पति उसी अंदाज से रहता है कि विवाह तो हाल ही में हुआ है। उसे यौन (YOUN) सुख और संबंध (SAMBANDH) उसी तरह चाहिए, जैसे प्रथम मिलन पर मिले थे। अकसर पित्त जाने-अनजाने उसकी गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) को दरकिनार कर देता है। यह जानते हुए भी कि इस अवस्था में पत्नी में कुछ शारीरिक, कुछ मानसिक परिवर्तन होते हैं- जैसे कि पहले तीन महीनों में गर्भाशय के मुख के आस-पास का रक्त का संचार अधिक हो जाता है, उस समय असावधानीपूर्वक या अधिक बार सम्भोग करने से गर्भाशय के निचले भाग पर चोट पहुँच सकती है और रक्तस्त्राव हो सकता है, जो कि मां और अंदर बढ़ते हुए गर्भ के लिए हानिकारक हो सकता है।

गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) के पहले तीन महीनों में स्त्री की मानसिकता में परिवर्तन होता है और शारीरिक बदलाव भी होता है। जैसे, मतली आना या जी मिचलाना, शरीर में थोड़ा भारीपन-सा महसूस करना, सुस्ती छायी रहना और सो जाने को जी करना। कभी उबासियां, तो कभी उबकाइयां आना, बार-बार पेशाब महसूस होना, कभी मां बनने की अत्यन्त खुशी तो कभी प्रसव के लिए सोच। इन सब बातों की उधेड़-बुन में यौन (YOUN) संबंधों में उसकी ज्यादा रूचि नहीं होती, परन्तु पति को ‘ना’ भी नहीं कर पाती और चाहे-अनचाहे अपने शरीर को अर्पित कर देती है। इससे उसके मन में एक प्रकार की कुंठा पैदा होती है। इसलिए पति को अपनी पत्नी की मनादेशा से अनभिज्ञ नहीं रहना चाहिए।  यदि पत्नी की कामेच्छा में असर आया है या कम है, तो पति को उसके साथ सहयोग करना चाहिए। प्रथम त्रिमास में तो अपने आप में थोड़ा काबू रखना ही चाहिए। आपसी स्नेह, प्रेम, लाड़-दुलार थोड़ा-बहुत चुम्बन-आलिंगन तक ही सीमित रहना चाहिए।  प्रथम गर्भ में अधिक उत्तेजना ठीक नहीं होती, इसलिए अधिक उत्तेजित हो कर या ज्यादा उन्मादित होकर यौन (YOUN) संबंध (SAMBANDH) नहीं बनाने चाहिए। इससे गर्भ को क्षति पहुंच सकती है।  गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) के आखिर चार सप्ताह में जब भू्रण का सिर तकरीबन नीचे उतर आता है, गर्भाशय ग्रीवा योनि की प्रमुख धुरी की सीध में आ जाती है, उन दिनों अति उत्तेजित हो कर सम्भोग करने से गर्भाशय ग्रीवा पर चोट पहुंचती है। इससे पानी की थैली फट जाने से प्रसव पीड़ा समय से पहले ही आरम्भ हो सकती है और बच्चे के लिए खतरा हो सकता है। इसलिए इन अंतिम सप्ताहों में सम्भोग नहीं करना चाहिए। गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) में सेक्स- कुछ हिदायतें-गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) में डाॅक्टरी जांच जरूरी है। यदि प्रथम गर्भ है, तो पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे के लिए शारीरिक या मानसिक उत्तेजना अधिक न रखें। प्रथम गर्भ को प्रसन्नता से लें, सहजता से लें, उत्तेजना से नहीं। दाम्पत्य संबंधों में पारस्परिक प्रेम की भावना का होना जरूरी है। आपी मन-मुटाव न रखें।

Garbhavastha Me Savdhani

-यदि गर्भाशय का किसी प्रकार का रोग है और साथ में गर्भ भी है, तो अपने आपको डाॅक्टर की देख-भाल में रखें। अगर हृदयरोग के साथ गर्भ भी है, तो बहुत ही सावधानी बरतें। डाॅक्टर की देख-रेख में रहें और सम्भोग तो बिल्कुल ही न करें, क्योंकि इस अवस्था में दिल पर भी बोझ पड़ सकता है।

-तीन माह के पश्चात बढ़ता हुआ भू्रण जब गर्भाशय में ऊपर पेट की ओर बढ़ता है, तो योनि में खतरा नहीं होता। ऐसे में सही ढ़ग से समागम करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, किन्तु प्रबल रूप से अधिक उत्तेजित होकर न करें।

-नौवें महीने में जब कि बच्चा पैदा होने का समय नजदीक आ रहा होता है, तो आखिरी चार-पांच हफतों में यदि सेक्स न किया जाए, तो अच्छा होता है, क्योंकि अधिक उत्तेजित होकर सम्भोग किया जाए तो पानी की थैली के फूट जाने का भय होता है, जो कि बच्चे के लिए भी और प्रसव के लिए भी खतरा बन सकती है। इसलिए पहले तीन महीने और आखिरी चार व पांच माह में बहुत एहतियात बरतनी चाहिए।

पति को पत्नी के शारीरिक परिवर्तन और मानसिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए उससे बहुत कोमलता और मधुरता का व्यवहार करना चाहिए। इसीलिए हमारे घरों में पुराने विचारों के लोग भी इस बात को मानते आए हैं कि गर्भवती स्त्री की हर प्रकार की इच्छा को पूर्ण करना चाहिए। उसका दिल नहीं दुखाना चाहिए।

गर्भाशय के रोग और सम्भोग-गर्भाशय में किसी प्रकार का रोग हो, तो भू्रण के बढ़ने में दिक्कत आ सकती है और यदि सम्भोग में सावधानी न बरती जाएं, तो मां और गर्भ को तकलीफ हो सकती है। अगर गर्भाशय ग्रीवा पर कोई रगड़ या कटाव है, तो चोट पहुंचने से पीड़ा और ग्रीवा से रक्तस्त्राव हो सकता है। यदि गर्भाशय में छोटे-छोटे फाइब्राइड्स हों, तो जोर से सम्भोग करने में शिशन से चोट पहुंच सकती है और गर्भपात का भय हो सकता है।

यदि किसी स्त्री के पहले गर्भपात हो चुके हों, चाहे वह किसी भी कारण से हों, विषेषकर गर्भाषय की कमजोरी अथवा उसमें गर्भ को अच्छी तरह थाम लेने की ताकत की कमी या गर्भाषय ग्रीवा-द्वार का मुख बहुत खुला होना, जिनमें गर्भपात का अधिक भय होता है, तो ऐसी अवस्था में समागम वर्जित है।

जिन स्त्रियों के अधिक बच्चे हो चुके हों, उनकी जननेन्द्रियों की मांसपेषियों ढीली पड़ जाती है। कभी पैल्विस की हड्डियों के जोड़ खुलकर अधिक लचीले हो जाते हैं, तो ज्यादा हिलने-डुलने से पीड़ा होती है। यदि योनि-द्वार पर योनि के भीतर या गर्भाषय ग्रीवा द्वार पर किसी प्रकार का इंफेक्षन है, तो पत्नी को समागम के समय पीड़ा होती है। गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) में अधिक पीड़ा का होना गर्भ के लिए ठीक नहीं।

Samay Se Pahle Prasav Kyo Hota Hai?  समय से पूर्व प्रसव क्यों ?

यदि गर्भावस्था (GARBHAVASTHA) के 37 वें हफते से पहले ही प्रसव हो जाये तो उसे समय से पूर्व प्रसव या प्रीटर्म लेबर कहते हैं।यह क्योें होता है-यदि गर्भिणी का स्वास्थ्य कमजोर हो और उसमें पोषण तत्व की कमी हो।-यदि गर्भिणी ने पहले कई बार स्वेच्छा से गर्भपात करवाया हो।-जुड़वां बच्चों के साथ, या हाइड्रोएमनियोस (बच्चे की पानी की थैली में ज्यादा पानी हो), बच्चों में कुदरती गड़बड़ियों के कारण जैसे हाइड्रोकेफालस, मेनिनगोमाइलोसील, एक्जेमफैलोस इत्यादि। -कभी-कभी पानी की थैली समय से पूर्व ही फट जाती है तो प्रसव वेदना शुरू हो जाती है। -यदि गर्भिणी को तेज बुखार या दस्त, पेषाब की थैली में एवं गुर्दे में सूजन हो (जिसे पाइलोनेफ्राइटिस, सिस्टाइटिस कहते है) तथा टाक्सोप्लासमोसिस के कारण भी यह हो सकता है। यदि गर्भिणी को ये बीमारियां होें, जैसे- उच्च रक्तचाप, मधुमेह की बीमारी, रक्त अल्पत, हृदयरोग, ने-फ्राइटिस (वृक्क में सूजन)।-यदि जरायु, गर्भाषय के द्वार में स्थित हो।-यदि गर्भ ग्रीवा की मांसपेषिया किसी वजह से कमजोर हों और ग्रीवा का मुंह थोड़ा दबाव में ही खुलना शुरू हो जाये, जिसे सरवाइकल इनकंपीटेंस कहते हैं।