Gale (Throat) Cancer Treatment In Hindi

Throat Cancer Treatment In Hindi

गलार्बुद या Gale Ka Cancer निम्नलिखित स्थानों में आरंभ हो के बढ़ सकता है-
-जीभ एवं टांसिल के बीच के गढ़ में आरंभ हो आगे की ओर बढ़ना।
-आगे जीभ के किनारों तथा मुख भूमि ।सअमवसने के साथ पर बढ़ना।
-तालु, गलशुंडि टांसिल में शुरू हो बढ़ना।

Gale (Throat) Cancer Karan

-मद्यपान का अति सेवन।
-चूसने वाली तमाकू का नियमित सेवन।
-पान का अधिक प्रयोग।
-लौह की कमी से उत्पन्न रक्तन्यूनता (सहायक कारण)।
यह कैंसर पुरूषों में 60 वर्ष से अधिक की अवस्था में सर्वाधिक रूप से पाया जाता है।

 

Gale (Throat) Cancer Lakshan

1- इस प्रकार के कैंसर में आरंभ में कोई लक्षण नहीं होते हैं और न ही रोगोत्पत्ति का ज्ञान हो पाता है। बाद में गले में एक विशेष प्रकार के कष्ट की अनुभूति होने लगती है। उसके गले में काँटे जैेसे चुभने का-सा दर्द होता है। उसके बाद ही गले में खचखच पीड़ा मालूम होने लगती है। आँखों में भी कष्ट का बोध लगता है और धीरे-धीरे सख्त पदार्थ खाना असंभव हो जाता है। गले में फोड़े के समान कष्ट प्रतीत होने लगता है। निगलने में कष्ट होने लगता है। ग्रसनी में चुभन-सी अनुभव होती है। गलतुंड़िकाओं (टांसिल्स) में कष्ट होता है, गला बैठ जाता है, मुख से लगातार लार टपकने लगती है और रोगी केवल तरल पदार्थ ही खाकर जीवन व्यतीत करने लगता है।

2- आवाज बदल रही हो या भारी हो रही हो

3- मूसड़ों में सूजन या दांतों में दर्द

4- खाना खाने में परेशानी

5- कफ आना और इसमें कई बार रक्त के धब्बे दिखना

6- लगातार वजन कम होना।

7-  कई बार कैंसर के प्रारंभ में गले के भीतर या बाहर एक सुपारी के बराबर अथवा उससे छोटी आकृति की ग्रंथियाँ उत्पन्न होती है। ये ग्रंथियाँ गले के विभिन्न स्थलों में विभिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं (कर्णमूल के नीचे, श्वास नली के ऊपर, अन्न नली के प्रवेष में, मुखविवर के पश्चात् भाग में, उपजिहृा के नीचे गलकोष के सम्मुख भाग में तथा कभी कंठरंध्र के पाष्वस्त पेषियों के ऊपर)। बाद में ग्रंथित शोथ के बढ़ने एवं स्थिर बन जाने से बोलने में कठिनाई होने लगती है, मुख कठिनाई से खुलता है। मुख की क्रियाओं में बाधा पड़ने लगती है।

8- लगातार थकान, नींद कम आना

9- मुंह के अंदर लाल, सफेद या गहरे रंग के पैचेज बनना

10- खाना चबाने या जीभ को हिलाने में दर्द का अनुभव

11- सांस से दुर्गंध महसूस होना या कान में अकारण दर्द

12- प्रथमावस्था में ये अर्बुद विषेष यंत्रणाप्रद नहीं होते है। किसी क्षेत्र में ये अर्बुद 10-12 वर्ष तक किसी प्रकार का कष्ट नहीं देते और बाद में 3-4 मास के भीतर प्रबल रूप से बढ़कर पत्थर से भी अधिक कड़े हो जाते हैं। कभी-कभी बहुत से छोटे-छोटे इकट्ठे होकर एक वाल्मीक स्तूप की तरह का रूप ग्रहण कर लेते है। इस अवस्था में ये अर्बुद रोगी के शरीर में रस, रक्त, मज्जा आदि को शोषित करने लगते है। रोगी का शरीर क्रमषः जीर्ण शीर्ण होने लगता है। बढ़ा हुआ अर्बुद क्रमषः श्वास रोकने की चेष्टा करता है। इस अवस्था में रोगी का स्वर भंग हो जाता है। कभी-कभी स्वरभंग प्रथमावस्था में एकाएक होते देखा गया है और इसमें भ्रमवष रोगी व चिकित्सक मामूली सर्दी लगना मान लेते है और उसी की चिकित्सा करने लगते है, तब रोगी की प्रकृति देखकर रोग के निर्णय की चेष्टा होने लगती है। कई्र बार इसी प्रकार रोगी को दीर्घ समय तक स्वर भंग, श्वास कष्ट, ज्वर तथा खाँसी देखकर अनेक प्रसिद्ध चिकित्सक इस रोग को यक्ष्मा बताकर संदेह में डाल देते है। संदेह को दूर करने के लिए रोगी के कफ और मूत्रादि की परीक्षा कर जब यक्ष्मा का कोई चिन्ह नहीं मिल पाता है तब चिकित्सक को दूसरे रास्ते पर अग्रसर होना पड़ता है। लेकिन यह सत्य है कि कैंसर रोग में कोई पार्थक्य नही रहता, किन्तु प्रथमावस्था में क्षय रोग के साथ कोई समता नही दिखती।

14- गले में गांठें महसूस हों

15- मुंह में लगातार दर्द रहे, खून निकले

16- गले में जकडऩ, सांस लेने में तकलीफ

17- कफ के साथ अल्पमात्रा में कैंसर की प्रथमावस्था में कभी-कभी गले से रक्तस्त्राव होते देखा गया है, जिसे रोगी मसूड़ो आदि स्थानों से आया रक्तस्त्राव की कल्पना कर लेता है और चिकित्सक भी शुरूआत में कैंसर रोग के सूत्रपात की कल्पना नहीं कर पाते। अक्सर इस प्रकार थोड़ी मात्रा में रक्त आरंभ होकर गले के भीतर एक क्षययुक्त घाव की पुष्टि कर देता है जो बाद में जटिल कैंसर बन जाता है।

उपरोक्त लक्षणों के अतिरिक्त स्थानिक रक्तस्त्राव, मुख से बदबू का आना तथा कान में दर्द इसके सहायक लक्षण हैं। जब गलतुडिकाएँ अक्रात हो जाती है। तब अक्रात भाग की गलतुंडिका शोथयुक्त तथा व्रणयुक्त हो जाती है। यह छूने में कठोर होती है। व्रण (घाव) तथा द्वितीयक उपसर्ग (सेंकेंडरी इंफैक्षन) के कारण रोगी को असह्य रूप से स्थानिक वेदना होती है, पर यह लक्षण अधिक व्यापक होते हैं।

Note- यदि ग्रसनी का पृष्ठ भाग अक्रात हेता है तब निगरण कष्ट इसका एक प्रमुख लक्षण माना जाता है।
इस प्रकार के कैंसर में फूलगोभी के फूल की तरह मांसाकुर की वृद्धि- रोग के प्रारंभ में जीभ के नीचे श्वास नली या कंठनली के बगल में छोटी मटर के बराबर एक मांसपिड दिखाई पड़ता है और यह धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इस समय इसके चारों तरफ भी छोटे-बड़े कई मासपिंड उत्पन्न हो जाते हैं। ये बढ़कर फूलगोभी के फूल की तरह हो जाते हैं।
बढ़ने के समय इन मांस पिंडो से बहुत ही दुर्गंधित रस निकलता है। यह गंध अति तीव्र होती है और जो चिकित्सक नहीं भी है वे भी इस गंध की विषेषता के कारण कैंसर रोग का निर्णय कर सकते हैं। क्रमषः कड़ा होने वाले मांस पिंड के हाथ द्वारा स्पर्ष करने मात्र से रक्तस्त्राव शुरू हो जाता है। बढ़ी हुई अवस्था में मांस पिंड के मूल से लेकर षिराएँ और उपषिराएँ तक षिथिल पड़ जाती है और रोगी उठने में भी असमर्थ हो जाता है।
16-18 वर्ष बाद किसी-किसी की अंतिम अवस्था में मांस पिंड गलने लगता है और थोड़ा-थोड़ा गलकर लार, पीव तथा रक्त के साथ बाहर निकलने लगता है। रोगी शक्तिहीन हो जाता है। जीवन शक्ति क्षीण होकर चेतना लुप्त हो जाती है।
एक से अधिक अंगों में रोग की उत्पत्ति-गलें में कैंसर की मध्यावस्था में देखी जाती है। इस समय गले की ग्रंथि की वृद्धि क्रमषः बंद हो जाती है और रोगी के यकृत के ऊपर पीड़ा होने लगती है। इस वेदना से यकृत के ऊपर और एक ग्रंथि की उत्पत्ति हो जाती है और यही यकृत कैंसर में बदल जाता है।
कैंसर रोग की अंतिम अवस्था बड़ी ही कष्टप्रद और भयानक होती है। रोगी में निद्राहीनता के साथ अनेक उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं जैसे- वमन तथा मिलती का होना, अंगों में शोथ, कंपन, गले में खराष हो जाना, घाव के भीतर लाई की तरह सफेद कीड़ा पड़ जाना, जीभ की गति और जबड़ा बंद हो जाना, लार बाहर फेंकने में असमर्थता, प्यास की अधिकता, अतिसार और मस्तिष्क में तीव्र पीड़ा आदि।

Gale (Throat) Cancer पहचान

रोग की पहचान प्रारंभिक अवस्था में कठिन है। इसका प्रत्यक्ष निदान स्वारयंत्रदर्षन (लैरिंगोस्कोपिक एक्जमामीनेषन) तथा बायोप्सी परीक्षा से होता है।

Gale (Throat) Cancer Treatment

चिकित्सा- आरंभ में ही यदि गले में उत्पन्न ग्रंथि का ज्ञान हो जाए और रोग न बढ़ा हो, तो यापन द्वारा रोग को अधिक बढ़ने से रोक या उसकी वृद्धि की गति कम करें। इसके लिए निम्न उपचार किए जा सकते हैं-
-रोगी के शरीर बल को बढ़ाया जाए। इसके लिए दषमूल सिद्ध घृत प्रषस्त रहता है।
-ग्रंथिजय शोथ के लिए ग्रंथि अर्बुद नाषक कल्पों का प्रयोग करें। यथा-काचनार गुग्गुल, रौद्ररस, चिंता भल्लातक वटी, वरूणादि क्वाथ।
-रेडियोथेरेपी का प्रयोग किया जा सकता है।
-यदि रोग बढ़ने लगे तो शस्त्रकर्म चिकित्सा उपयुक्त रहती है।

Gale (Throat) Cancer Me याद रहे-

जहाँ शस्त्रकर्म या अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ उपयोग में न लाई जा सकें वहाँ रसायन चिकित्सा का उपयोग किया जा सकता है। यथा-
वर्धमान भल्लातक, वर्धमान गुग्गुल, यह दोनों ही अनुभूत एवं यापनार्थ उपयोगी कल्प है।

प्रतिषेधात्मक उपचार- रोग न होने देने का प्रयास सर्वोत्तम मार्ग है। इसके लिए-
1-जिन कारणों से रोग होता है उनका परित्याग करें।
2-मुख एवं गले से संबंधित स्वास्थ्य वृत्त संबंधी दिनचर्या का पालन कराया जाए। यथा
3- नित्य गरारे कराए जाएँ।
4- सुपारी, पान मसाला, गरम पेय आदि स्थानिक क्षोभकारक कारणों को छुडवाएँ।
5- जीर्ण प्रतिषयाय, टांसिल वृद्धि, जिहृा गलषोथ की तत्काल उपयुक्त चिकित्सा करें।
6- अनावष्यक मुख संबंधी शल्यकर्म से बचे।

Gale (Throat) Cancer  लक्षणानुसार Ayurvedic Treatment –

1 – तीव्र ज्वर की अवस्था में- संषमनी वटी 3-3 गोली दिन में 3 या 4 बार दें।

2 –  अन्नपान की गति के अवरोध के लिए- पंच वल्कल क्वाथ से गरारे कराएँ। कभी-कभी शोथ में दर्द होता है। इसके लिए यष्टिमधु चूर्ण के क्वाथ से अथवा दषमूल क्वाथ से परिषेक कराना चाहिए। क्वाथ कुपोषण होना चाहिए। वेदनानाषक औषधि जैसे कि निद्रोदय रस आदि सेवन कराएँ।

3- कभी-कभी शोथ में व्रण उत्पन्न हो जाता है। अतएव व्रण के लिए- पंचवल्कल क्वाथ से व्रण को धोएँ और जाल्यादि तैल से रोपणार्थ व्रण कर्म (ड्रेसिंग) करें।

4- एक अन्य अनुभूत योग- वरूणादि क्वाथ 20 मि.ली. दिन में 2 बार सेवन करायें। साथ ही कांचनार गुग्गुल की 3-3 गोली दिन में 2 बार खिलाएँ।
-इस रोग में सप्तपर्पटी का उपयोग प्रषस्त रहता है।

Gale Ke Cancer Se Bachav के लिए यह आवष्यक है कि लोगों में यह जाग्रति पैदा कर दी जाए कि खैनी, तमाकू तथा सुरती इत्यादि के सेवन से कैंसर होने की अत्यधिक संभावना रहती है। इस बुरी आदत को यथासंभव छोड़ देना चाहिए। इससे कैंसर होने की संभावना में अत्यधिक कमी आ जाती है।

कुछ अन्य व्यवस्थाएँ लक्षणों के अनुसार Gale (Throat) Cancer Treatment –

1st stage Gale (Throat) Cancer – (कंठ के भीतर अथवा बाहर सुपारी के समान या उससे छोटी आकृति की एक विषेष ग्रंथि एवं कई मिलकर एक बड़े पिंड रूप में, रोगी का जीर्ण- शीर्ण होना, कंठ अवरोध एवं स्वर भंग की स्थिति, निगलने में कष्ट एवं अकस्मात् खाँसी प्रारंभ)-

  • पंचकर्म (वमन-विरेचक एवं वस्ति) के पश्चात्- काचनारगुग्गुल 2 ग्राम, रस माणिक्य 250 मि.ग्रा- दोनों को पीसकर एक मात्रा बना लें। ऐसी 1 मात्रा घृत 6 ग्राम तथा मधु 12 ग्राम के साथ लेकर ऊपर से महामंजिष्ठादि कषाय 25 मि. ली. खादिरारिष्ट 20 मि. ली. जल 40 मि. ली., इनको मिलाकर भोजनोपरांत दिन में 2 बार दें- उपरोक्त उपचार से 2-3 सप्ताह के उपरांत रोगी को सुख का अनुभव होने लगता है। आरोग्य लाभ के लिए प्रथमावस्था में लगभग 2 या 3 मास तक सतत सपथ्य उपचार जारी रखना चाहिए।

2nd Stage Gale (Throat) Cancer Treatment- (गला/कंठ घाव की स्थिति में, अत्यधिक लार का गिरना, कभी-कभी पीव होना) यदि उपद्रव रूप में ज्वर भी विद्यमान हो, तो-

  • गोदंती, हरताल भस्म 500 मि. ग्रा., अमृतासत्व 1 ग्राम- इन औषधियों को पूर्वोक्त औषधियों के साथ मिलाकर दिन में 3 बार सेवन कराना चाहिए।
  • अर्बुद के आकार में वृद्धि, वेदना, कोथ, शोथ, कास और अंग पीड़ा होने पर-किषोर गुग्गुल 1 ग्राम, त्रिलोक्य चिंतामणि रस 125 मि. ग्रा.- दोनों को मिलाकर एक मात्रा तैयार कर लें। ऐसी एक मात्रा दिन में 3 बार श्यामा तुलसीपत्र रस तथा मधु के साथ दें। खदिरारिष्ट 20 मि.ली. सारिवाद्यासव 20 मि.ली., ताजा जल 40 मि.ली., मिलाकर भोजनोपरांत दिन में 2 बार देना चाहिए।
  • स्थानीय वेदनार्थ शमन हेतु दषांग लेप में गुग्गुल मिलाकर गोमूत्र में महीन पीसकर, गुनगुना कर वेदना स्थल पर गाढ़ा लेप लगाना चाहिए।

3rd Stage Gale (Throat) Cancer Treatment – (कैंसर की भीषण भयावह स्थिति- ग्रंथियों में गलन, कंठावरोध, रक्तस्त्राव, वमन दुर्गंध आदि उपद्रव)-इसमें जो उपद्रव स्वरूप प्रबल पीड़ाप्रद व्याधि हो, उसका विषेष प्रतिकार करना आवष्यक है। इस प्रकार-

  • महातालेष्वर रस 250 मि. ली., सोमनाथी ताम्र 125 मि. ग्रा., पंचतिक्त घृत गुग्गुल 1 ग्राम- तीनों को मिलाकर मधु के साथ दिन में 3 बार दें।
  • महामंजिष्ठाद्यरिष्ट 20 मि. ली., खदिरारिष्ट 20 मि. ली., समभाग जल मिलाकर भोजनोपरांत दिन में 2 बार देना चाहिए।