Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali (ग्रासनली ) Cancer

esophagus cancer in hindi

Esophageal Food pipe ग्रासनली का कैंसर Khane ki nali ka Cancer – पाचन मार्ग के कैंसर में ग्रासनली का कैंसर स्त्रियों की अप्रेक्षा पुरूषों में अधिक पाया जाता है। यह अधिकतर 40 वर्ष से 60 वर्ष की अवस्था में देखा गया है, पर स्त्रियों में यह 30 वर्ष की अवस्था पष्चात् किसी भी उम्र में देखा जा सकता है। अंग्रजों की अप्रेक्षा काले लोगों में यह अधिक होता है। यह रोग अधिकांष बंगाल में पतले स्त्री और पुरूषों में अधिक पाया गया है। ग्रासनली या Esophagus करीब 9 इंच लंबी नली है जो फैरंक्स को आमाषय (स्टोमक) से जोड़ती है। इससे अमाषय में भोजन उतरता है। सभी प्रकार के कैंसर रोगों में ग्रासनली, जिसे अन्न की नली भी कहते हैं का कैंसर विषेष रूप में मारात्मक होता है। यह अधिक कष्टदायक तथा शीघ्र प्राणनाषक भी होता है।

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Food Pipe Cancer Treatment In Ayurveda

Esophageal Food pipe ग्रासनली का कैंसर Khane ki nali ka Cancer Karan 

1 मुख की गंदगी।

2 सूखे तथा कड़े खाद्य पदार्थों का सेवन।

3 अत्यधिक मात्रा में शराब का पीना तथा अत्यधिक गरम चाय का सेवन। श्षराब जिसमें पानी न मिलाया गया हो।

4 कभी-कभी मुख तथा ग्रसनी के कैंसर के कारण भी इस रोग के होने की संभावना अधिक रहती है।

5 तीक्ष्ण पदार्थो को सेवन (अथवा मिर्च-मसालों से बने तीक्ष्ण खाद्य पदार्थों का सेवन)।

6 सिफिलिस को भी कहीं-कहीं इसका कारण है।

7 भोजन प्रदूषण महत्वपूर्ण कारक है।

8 तम्बाकू और शराब का सेवन भी कैंसर बनाने में अपना योगदान देते है। भोजन में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, ग्रासनली का एक्लेजिया और ग्रासनली का वैरट रोग से भी। 

हमारे भोजन में अधिक तीखा, गर्म या मसालेदार जो भी तत्व होते हैं, हमारी ग्रासनली उनके संपर्क में सीधे आती है। इसके अलावा मुँह की लार में घुलने के बाद तमाकू और मसाले जैसे कैंसर कारक पदार्थ भी लार के साथ-साथ ग्रासनली से गुजरते हैं। जिन व्यक्तियों में अत्यधिक मद्यपान के सेवन से यकृत सिरोसिस, धूम्रपान तथा तम्बाकू का अत्यधिक सेवन का इतिहास मिलता है, उनमें ग्रासनली का कैंसर अधिक होता है। लगभग 90 प्रतिषत रोगियों में प्रथम लक्षण निगलने में परेषानी होती है। वजन घटना भी एक लक्षण हो सकता है। यह मेटास्टेसिस से पहले आस-पास के भागों में तेजी से फैलता है अतः निगलने में जरा-सी परेषानी होने पर डाॅक्टर को दिखाना अथवा डाॅक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

Esophageal cancer Ke Lakshan

  • ग्रासनली के मार्ग में एक घाव या गाँठ के रूप में यह कैंसर (Cancer )उत्पन्न होता है और धीरे-धीरे आस-पास के क्षेत्र में फैलकर अन्न प्रणाली के मार्ग को संकुचित करता है। यह जैसे-जैसे फैलता जाता है, मार्ग और संकुचित होता जाता है, वैसे-वैसे निगलने में कष्ट बढ़ता जाता है। अन्त में पानी भी नहीं पीया जा सकता है।
  • धीरे-धीरे जो भी चीज निगली जाती है उसकी उल्टी हो जाती है।  यदि यही रोग ऊपरी भाग में अत्यधिक बढ़ जाता है, तो आवाज आदि में भी बदलाव आ जाता है। किसी-किसी में खून की उल्टी भी होती है। कोई वस्तु निगली जाए तो खाँसी के लक्षण पैदा होते है। रोगी को ग्रासनली में वेदना भी होती है। यह वेदना उरोस्थि के नीचे अत्यधिक रूप से प्रतीत होती है। कभी-कभी गले, ग्रीवा अथवा कान की दिषा की ओर बढ़ने लगती है।
  • रोग की उग्रावस्था में मुख से कोथ जैसी दुर्गंध आने लगती है। किसी-किसी रोगी में लालस्त्राव के लक्षण भी मिलते है, जो ग्रासनली के अवरोध के कारण होते है।  खाना निगलने में परेषानी होना, इस कैंसर का प्रमुखतम लक्षण है। परन्तु जब तक रोगी को यह परेषानी महसूस होना प्रारंभ होती है, तब तक खाने की नली के व्यास में लगभग 50 प्रतिषत की कमी हो चुकी होती है।
  • धीरे-धीरे पानी तथा अन्य द्रव पदार्थो के लेने में दिक्कत होने लगती है। रोग अधिक बढ़ने पर रोगी खाना खाने और पानी पीने को तरसने लगता है।  दर्द का अनुभव भी बढ़ी हुई अवस्था में ही होता है। वजन का गिरना, पर्याप्त भोजन न ले पाने के कारण इस रोग में अधिक मिलता है।
  • खाने की नली से श्वास नली में रोग का प्रसार होने पर पानी पीने पर खाँसी की षिकायत होने लगती है। कभी-कभी यकृत में प्रसार होने पर पीलिया या पेटदर्द की षिकायत हो जाती है।  हृदय की झिल्ली में रोग पहुँचने पर दिल की बीमारी जैसे लक्षण भी हो सकते है।
  • रोगी को साँस लेने में तकलीफ भी होती है। क्षोभ के कारण किसी-किसी रोगी को अत्यधिक खाँसी आने लगती है जिससे रोगी में अनेक फेफड़ों संबंधी उपद्रव पैदा हो जाते हैं तथा रोगी को ज्वर आने लगता है। षरीर भार में कमी आकर रोगी में क्षीणता उत्पन्न हो जाती है। अन्त में भोजन न मिलने के कारण रोगी मर जाता है।

Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali (ग्रासनली ) Cancer की पहचान-

रोग का प्राथमिक निदान ग्रासनलीदर्षी द्वारा होता है। ग्रासनली दर्षन की सहायता से कैंसर भाग का कुछ टुकड़ा निकालकर उसकी जीवोति परीक्षा (बायोप्सी परीक्षा) करनी चाहिए। रोग का निदान एक्स-रे परीक्षण, इक्सफोलिएटिव साइटोलाॅजी के द्वारा भी आजकल संभव है।

Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali (ग्रासनली ) Cancer से बचाव-

Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali (ग्रासनली ) Cancer निम्न तरीको से से बच सकते हैं-

1 नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराते रहें।

2 निगलने में कोई कठिनाई होने पर डाॅक्टर से परामर्ष लें।

3 जीवन की रक्षा-प्रारंभिक अवस्था में कैंसर की पहचान व इलाज से ही कर सकते हैं।

4 मुख की गंदगी तथा मुख के अन्दर के सभी प्रकार के रोगों से बचना चाहिए। इसलिए मुख सफाई प्रतिदिन आवष्यक है।

5 शराब का प्रयोग नही करना चाहिए। 6 अत्यधिक गर्म चाय का सेवन शरीर के लिए वैसे भी हानिकारक है, इसलिए उसका भी प्रयोग नहीं करना चाहिए।

7 तम्बाकू से और भी अंगों का कैंसर हो सकता है, इसलिए तम्बाकू तथा उससे बनी हुई वस्तुओं को प्रयोग नहीं करना चाहिए।

Esophageal Cancer -Food pipe (Khane Ki Nali -ग्रासनली ) Cancer Ayurveda Treatment

Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali  ग्रासनली कैंसर Cancer की आयुर्वेदिक चिकित्सा-

ग्रासनली कैंसर की आयुर्वेदीय चिकित्सा के अंतर्गत निम्नलिखित व्यवस्था से  लाभ मिलता है-

ग्रासनली के कैंसर से पीड़ित रोगी को भोजन काफी देर तक चबाकर निगलने की आदत डालनी चाहिए। ऐसा कार्यक्रम लम्बे समय तक जारी रखना चाहिए। इससे रोग की चिकित्सा में पर्याप्त लाभ मिलता है। इसके साथ ही-1 हरीत की एवं हर्रे के बड़े-बड़े टुकड़ों को मुख में रखकर उसके स्वरस को बराबर चूसना चाहिए। इससे कैंसर के रोगी को पर्याप्त लाभ मिलता है।

देखा गया है कि यदि रोगी 1000 हर्रो के टुकड़ो को मुख में रखकर चूस लेता है, तो इतना करने से कैंसर के समूल नष्ट होने में पर्याप्त सहायता मिलती है।

2 ग्रासनली के कैंसर की चिकित्सा में कुछ विषेष प्रकार की पर्पटी का उपयोग किया गया है, जिनसे कैंसर के आकार में शीघ्र कमी आकार रोग समूल नष्ट हो जाता है। यह पर्पटी हैं-1 रसेंद्र पर्पटी2 वज्र पर्पटी3 गंग पर्पटीइन में से किसी भी पर्पटी का उपयोग अनुभवी वैद्य की देखरेख में लिया जा सकता है।

3 ‘सोमान्थ ताम्र’ को अदरक स्वरस और मधु के साथ प्रतिदिन प्रातःकाल कुछ दिनों तक लेते रहने से अर्बुद के आकार में पर्याप्त कमी आ जाती है। गला साफ हो जाता है और भोजन आसानी से गले के नीचे उतरने लगता है।

4 शुष्क अदरक तथा गोक्षुर का क्वाथ नियमित रूप से सेवन करने से कैंसर रोग में पर्याप्त लाभ मिलता है। अथवा- आमलकी, हरीतकी, विभीतिका तथा नीम की छाल का क्वाथ सेवन करें, उत्तम लाभकारी है।

5 ताम्रपर्पटी का उपयोग इस कैंसर में बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। इसे निर्धारित मात्रा में देने से अर्बुद के आकार में कमी आती है और भोजन आसानी से गले के नीचे उतरने लगता है।

6 रसपर्पटी में 125 मि.ली., कुछ बूँद मधु, 250 मि.ग्रा. ऐनीस (जिरखाम) मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से अर्बुद का नाष होता है।

7 कृष्ण चतुर्मुख को त्रिफला के साथ दोपहर के समय नियमित रूप से 2-3 माह तक सेवन करने से आषातीत लाभ मिलता है। साथ ही जीर्ण अम्लीयता का नाष होता है।

8 फेफड़ों के अक्रांत होने पर वानसपत्र हरताल भस्म 30 मि.ग्रा. नित्य प्रति सेवन करने से उत्तम लाभ मिलता है। विषेष व्यवस्था-ग्रासनली के कैंसर में रोगी के आहार के अंतर्गत दुग्ध, घी के साथ अथवा ठंडा तथा गरम दूध, फल तथा हलुए का सेवन उत्तम माना गया है।

रोग की प्रथमावस्था में चावल का भात तथा कढ़ी का सेवन उत्तम रहता है। जब रोगी को आहार निगलने में कष्ट हो रहा हो, तब हिंगाष्टक चूर्ण का सेवन करना अति उत्तम रहता है। यदि इस चूर्ण का सेवन मुख भरकर किया जाए तो श्रेष्ठ रहता है। उपचार- षल्यचिकित्सा तथा रेडियोथेरेपी का प्रयोग एक साथ या अकेले कैंसर की स्थिति को देखकर कर सकते हैं। कीमोथैरेपी का इस कैंसर के इलाज में विषेष महत्व नहीं है।

Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali  ग्रासनली कैंसर Cancer की आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा-

ग्रासनली के निचले भाग में स्थित कैंसर के लिए यह उपयुक्त विधि है। इससे ट्यूमर को पूरी तरह निकाल सकते हैं, तथा कान्स्ट्रक्टिव सर्जरी द्वारा कोलन का एक भाग ग्रासनली के निचले भाग की जगह लगा सकते हैं।

Esophageal Food pipe -Khane Ki Nali  ग्रासनली कैंसर Cancer की आयुर्वेदिक रेडियेषन थेरेपी-

इसका प्रयोग उस समय किया जाता है जब कैंसर इसोफेगस के ऊपरी भाग में होता है। इसमें रेडिएषन द्वारा कैंसर कोषिकाओं को सामान्य कोषिकाओं की अपेक्षा कम से कम हानि पहुँचाए हुए नष्ट कर देते हैं। तत्पष्चात् शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के बाद बची हुई कोषिकाओ को भी रेडिएषन द्वारा नष्ट किया जा सकता है। जब दोनो का प्रयोग साथ-साथ किया जाता है, तो यह नहीं समझना चाहिए कि रोग बहुत गंभीर है, बल्कि हर मरीज के कैंसर का प्रकार भिन्न होता है तथा उसका इलाज भी भिन्न होता है।  पेट में खाने की ट्यूब लगाकर या ग्रासनली के अन्दर ट्यूब लगाकर देते है। पेट में ट्यूब लगाना आसान होता है और आवष्यकतानुसार इसे भविष्य में निकाल भी सकते है। साइड इफैक्ट्स- वमन, मितली तथा थकान का होना हो सकते हैं, जो आराम व अच्छे भोजन से दूर हो जाते है।

ग्रासनली कैंसर के रोगी 4 प्रतिषत ही 5 वर्ष तक जीवित रह पाते हैं। पर आजकल सर्जरी व रेडिएषन के मिले-जुले प्रयोग से अच्छे परिणाम सामने आए है। ग्रासनली कैंसर की चिकित्सा में कीमोथेरेपी, बाह्य विकिरण चिकित्सा और अंतः विकिरण चिकित्सा के समन्वित सहयोग से अब कुछ अच्छे नतीजे सामने आ रहे है।